यूरोप यात्रा-8
यू पहुंचे सपनों के शहर लंदन
विजय सिंह 'कौशिक'
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| लंदन के साईथइंड एयरपोर्ट पर |
आज
(18 मई 2018) पेरिस को अलविदा करने का
समय आ गया था। दोपहर 12 बजे हमारी पेरिस से लंदन के लिये फ्लाइट थी। मेरा एक सपना पूरा होने जा
रहा था। जब से मैंने होश संभाला है, भारत से बाहर लंदन ही वह एक जगह है, जहाँ जाने की मैं कल्पना
करता था। शायद इतिहास में रुचि होने कारण इस शहर के प्रति यह रुचि उपजी हो। आखिर 200 सालों से अधिक समय तक
हमारे देश के भाग्य का फैसला इसी शहर लंदन से तो होता रहा। इसी शहर से अंग्रेजों ने
इतने लंबे समय तक भारत पर राज किया। इसी शहर ने भारत को इंडिया बनाया जो आजादी के 70 वर्षों बाद भी भारत नहीं
बन सका। भारत उर्फ इंडिया के इतिहास के पन्नो में लंदन का नाम बार-बार दर्ज है। इस
शहर का नाम देश के दूरदराज के गांवों में रहने वाला बुजुर्ग भी जानता है। हमारी
बॉलीवुड की फिल्मों में भी अक्सर यह शहर दिख जाता है।
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| लंदन के ट्यूब ट्रेन प्लेटफार्म पर |
आखिरकार आज इस लंदन को साक्षात देखने का मेरा बचपन का सपना पूरा होने जा
रहा था। हालांकि अभी भी मन मे दुविधा थी। लंदन जाने को
लेकर अभी भी उहापोह की स्थिति बनी हुई थी। दरअसल मेरे यूके के वीसा में स्पेलिंग
मिस्टेक हो गई थी। आखिरकार यह सोच कर यात्रा करना तय किया कि यदि इमिग्रेशन
अधिकारियों ने नहीं जाने दिया तो एयरपोर्ट से लौट आएंगे। नीदरलैंड के अपने मित्र
लुइस भाई को भी बता दिया कि अपने तीनों साथियों के साथ मैं भी लंदन जा रहा हु।
नहीं जा पाया तो वहाँ से सीधे आप के घर पहुच जाऊंगा। पेरिस के होटल से चेक आउट कर
पास में स्थित रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर एयरपोर्ट पहुचना था। नारो दे रेलवे
स्टेशन से जो ट्रेन मिलती है, वह सीधे एयरपोर्ट के भीतर
पहुचा देती है। प्लेटफॉर्म और एयरपोर्ट के बीच बस एक सीढ़ी का अंतर है। स्वचालित
मशीन से हमने टिकट खरीदा और एयरपोर्ट वाली ट्रेन पकड़ने प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गए।
मैं और दिनेश सिंह जी ट्रेन में सवार हो गए पर आदित्य जी राजकुमार जी के ट्रेन
पकड़ने से पहले वह छूट गई। इस बीच मैंने 2 हजार रुपये खर्च कर अपना
मोबाइल दो दिनों के लिए अपना मोबाईल नंबर रोमिंग करा लिया था। यह सुविधा काम आ गई।
आदित्य जी मेरे मोबाईल पर कॉल कर बोले कि आप दोनों एयरपोर्ट वाले रेलवे प्लेटफॉर्म
पर हमारा इंतज़ार करो। मैं राजकुमार सिंह अगली ट्रेन से आते हैं। अगली ट्रेन भी
सिर्फ 5 मिनट बाद की थी। मैं दिनेश
जी के साथ एयरपोर्ट रेलवे स्टेशन पहुच कर अपने दोनों साथियों का इंतज़ार करने लगे। 20 मिनट बाद वे दोनों भी आ
गए। स्वचालित सीढ़ियों से एयरपोर्ट पहुँच गए। यहां सुरक्षा जांच की औपचारिता पूरी
कर विमान पकडने के लिए आगे बढ़े तो पता चला कि लंदन जाने वाली हमारी फ्लाईट डेढ़
घंटे देरी से उड़ान भरेगी।
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| लंदन के भारतीय दुतावास में |
लंदन पहुँच कर हमें
एयरपोर्ट से सीधे लंदन के भारतीय दूतावास में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने
जाना था। उत्तर प्रदेश कम्युनिटी एसोसिएशन ऑफ यूनाइटेड किंगडम के संस्थापक संतोष
गुप्ता जी ने हमे आमंत्रित किया था। भारतीय दूतावास की तरफ से यह आमंत्रण हमे ईमेल पर
मिल चुका था। 1 घंटे 20 मिनट की हवाई यात्रा के बाद हम लंदन के साउथइंड एयरपोर्ट
पर थे। लंदन शहर और उसके आसपास कुल पांच एयरपोर्ट हैं। विमान से उतर कर सामने ही स्थित
इमिग्रेशन काउंटर पर पहुंच गए। यूरोप से बाहर के यात्रियों को इमिग्रेशन फार्म भी
भरना था। हम भी फार्म भरने में जुट गए। काउंटर पर पहुंचे तो इमिग्रेशन अधिकारी ने
पूछा क्यों आए हो लंदन और क्या करते हो। जवाब में मैंने बताया कि हम लंदन की सैर करने
आए हैं और पेशे से पत्रकार हैं। साथ ही भारतीय दुतावास के कार्यक्रम के बारे में भी
बताया। पत्रकार जान कर अधिकारी ने मुस्करा कर कहा वेलकम इन लंदन। बायोमैट्रीक मशीन
पर हमारी अंगुलियों की छाप का मिलान कर पासपोर्ट पर मुहर लगा कर हमें चलता किया।
बाहर सामने ही रेलवे स्टेशन था। एयरपोर्ट के गेट और रेलवे प्लेटफार्म की दूरी कुछ
ही कदमों की थी। देख कर अच्छा लगा कि यूरोपिय देशों में ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी
बहुत अच्छी और सुविधाजनक है। एक-एक हजार रुपए खर्च कर ट्रेन का टिकट निकाले और
पहली बार लंदन की ट्रेन में सवार हो गए। कुछ मिनटों की यात्रा के बाद हम भारतीय भारतीय दुतावास पहुंच चुके थे।
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| लंदन के रेलवे स्टेशन पर कानपुर वाले तिवारी जी के साथ |
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| लुटन में विनाद भाई व नट्टू भाई के साथ |
लंदन में दिनभर की यात्रा के लिए वन डे टिकट मिलता है। इससे आप यहाँ की
ट्रेन, ट्यूब ट्रेन ( यहाँ की
भूमिगत मेट्रो को इसी नाम से जानते हैं), डबल डेकर बस और टूरिस्ट बस
में यात्रा कर सकते हैं। लंदन एयरपोर्ट से निकलने के बाद हमने एक-एक हजार भारतीय रुपये खर्च कर
वन डे टिकट खरीदा था। दूतावास से स्टेशन पहुचे तो पता चला मेरा टिकट कही खो गया। 1 हजार की चपत लग चुकी थी।
पेरिस की तरह यहां भी टिकट खिड़की पर कोई टिकट बेचने वाला नही था। कार्ड से खुद ही
टिकट निकालनी थी। तिवारी जी ने इसमे हमारी मदद की। अपने कार्ड से मेरा लुटन जाने
के लिए टिकट निकाला। हमने कैश के रूप में टिकट का पैसा जबरन उनकी जेब के हवाले
किया और प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ गए। तिवारी जी हमे हमारी ट्यूब ट्रेन तक पहुचाने
प्लेटफ़ॉर्म तक आये। उनकी ट्रेन दूसरी दिशा से मिलने वाली थी। फिर मिलने के वादे के
साथ तिवारी जी से विदा लिया और अपनी मंजिल के लिए ट्रेन में सवार हो गए। विनोद भाई
लुटन स्टेशन पर कार के साथ हमारा इंतज़ार कर रहे थे। करीब 1 घंटे की यात्रा के बाद रात 12 बजे हम लुटन पहुच गए।
विनोद भाई ने देखते ही गले लगा लिया। रात में ठंड और बढ़ गई थी। खाना तो भारतीय
दूतावास में हो चुका था। इस लिए विनोद भाई के दो मंजिला बंगले में पहुच कर सोना ही बाकी था। (जारी)






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