यूरोप यात्रा-7



                       पेरिस में मोनालिसा का दीदार

                                                         विजय सिंह 'कौशिक'

पेरिस के सुप्रसिद्ध संग्रहालय लूव्र के स्वागत कक्ष पर हिंदी में उपलब्ध जानकारी पुस्तिका 

आज पूरा पेरिस शहर घूमने की योजना बनाई गई थी। पेरिस में कई पयर्टक बस सेवाएं चलती हैं। हमारे होटल के सामने से ही यह पर्यटक बस मिलती थी। सुबह 10 बजे तैयार होकर हम चारों साथी बस स्टॉप पर पहुँच गए। खुली छत वाली बस में नीचे वातानुकूलित कंपार्टमेंट और ऊपर डेक पर खुली जगह होती है। 30 यूरो (2400 भारतीय रुपया) का टिकट खरीद कर हम इस बस में सवार हो गए। बस में मुफ्त वाई-फाई की सुविधा थी, जिसका हमने जमकर लुत्फ उठाया। व्हाट्सएप वीडियो कॉलिंग के जरिये मुंबई में बैठे घर वालो को भी पेरिस की सैर करा दी। यह बस  शहर के विभिन्न पर्यटन स्थलों तक ले जाती है। आप वह बस छोड़ कर जिस स्थान पर जितना समय चाहे रुक सकते हैं और फिर अगली बस में सवार हो सकते हैं। हमारा पहला पड़ाव था सुप्रसिद्ध सेंट चैपल चर्च। यहाँ कुछ समय चहल कदमी कर हम आगे की यात्रा के लिए दूसरी बस पकड़ने के लिए बस स्टॉप पर आ गए। थोड़े समय में ही दूसरी बस आ गई और फिर से शुरू हो गई हमारी पेरिस यात्रा। शाम करीब 4 बजे तक हम इस पर्यटक बस से पेरिस शहर की सैर करते रहे। अब बस ने हमें हमारे होटल के सामने छोड़ दिया। अब तक दिनभर के सफर से थक चुके थे। शाम को सुजाता बजाज जी के घर जाना था। स्वतंत्रता सेनानी व प्रसिद्ध उद्योगपति जमनालाल बजाज परिवार की सदस्य सुप्रसिद्ध चित्रकार सुजाता जी ने हमे भोजन के लिए आमंत्रित किया था। 
पेरिस में रहने वाली भारतीय मूल कि सुप्रसिद्ध चित्रकार सुजाता बजाज जी के साथ 

होटल पहुँच कर आराम के लिए बिस्तर के हवाले हो गए। शाम 6 बजे सुजाता जी के घर जाने के लिए निकले। सुजाता जी ने अपने घऱ का पता हमे व्हाट्सएप कर दिया था। एक मेट्रो स्टेशन के ठीक सामने उनका घर था। हम मेट्रो ट्रेन स्टेशन के बाहर निकल कर सुजाता जी के घर का पता पूछ रहे थे, तभी सामने की एक हेरिटेज इमारत से सुजाता जी आवाज आई। भीतर जाने के लिए हम गेट पर पहुचे, पर इतनी शानदार इमारत में कोई वॉचमैन नहीं था। सुजाता जी ने एक कोड नंबर हमे एसएमएस किया। गेट पर लगे स्क्रीन पर वह नंबर डायल किया और गेट खुल गया। अब हम सुजाता जी के विशाल हाल वाले सुंदर घर मे थे। सुजाता जी अपनी फैशन डिजाइनर बेटी हेलेना से भी मुलाकात कराई। हालांकि पेरिस यात्रा से पहले मुंबई में लैक्मे फैशन वीक में हेलेना द्वारा तैयार कपड़ो का प्रदर्शन हुआ था। उस वक्त मेरी और आदित्य जी की हेलेना से मुलाकात हुई थी। नार्वे में जन्मी हेलेना अच्छी हिंदी बोलती हैं। सुजाता जी ने बताया कि विदेशी धरती पर पली-बढ़ी बेटी को अपनी भाषा हिंदी सिखाने के लिए कैसी मशक्कत करनी पड़ी। इस दौरान हमने सुजाता जी को मुम्बई हिंदी पत्रकार संघ की स्मारिका भेंट की।
                              थोड़ी गपशेप के बाद सुजाता जी पास में स्थित एक भारतीय रेस्टोरेंट में खाना खिलाने ले गई। होटल की मालकिन गोवा की रहने वाली है। उन्होंने सुजाता जी से शिकायत की कि वे इतने दिनों बाद उनके होटल खाना खाने आई। सुजाता जी ने उनसे हमारी मुलाकात कराई। पेरिस में हम अब तक भारतीय रेस्टोरेंट में ही खाना खा रहे थे पर इस होटल में हमें बेहद स्वादिष्ट भोजन मिला। होटल से निकल कर सुजाता जी हमे एक आइसक्रीम पार्लर में पेरिस की फेमस आइसक्रीम खिलाने ले गई। विदेशी धरती पर एक भारतीय की मेहमाननवाजी से हम बेहद प्रभावित हुए। अब सुजाता जी से विदा लेने का समय हो गया था। फिर मिलने के वादे के साथ हमने सुजाता जी से विदाई ली और मेट्रो ट्रेन प्लेटफार्म की ओर बढ़ गए और होटल पहुँच कर बिस्तर के हवाले हो गए। सुबह लूव्र संग्रहालय जाना था। इसी विश्व प्रसिद्ध म्यूजियम में मशहूर पेंटिंग मोनालिसा की ओरिजनल तस्वीर रखी गई है। 

           
 आज ( 18 मई 2018) पेरिस में हमारा तीसरा दिन था। सुबह स्नान-ध्यान के बाद हम मोनालिसा का दीदार करने लूव्र म्यूजियम के लिए रवाना हुए। लूव्र संग्रहालय (फ्रांसीसी भाषा में - Musée du Louvre)  देखने आने वाले अधिकांश लोगों की रुचि मोनालिसा की तस्वीर में ही रहती है। हम भी मोनालिसा की असली तस्वीर देखने ही गए थे पर वहाँ पहुंच कर पता चला कि इस विशाल संग्रहालय में देखने के लिए बहुत कुछ है। संग्रहालय मानव विकास का पूरा इतिहास समेटे हुए है। म्यूजियम में भारी भीड़ थी। 15-15  यूरो ( 1200 भारतीय रुपया) का टिकट लेकर हम भी म्यूजियम में प्रवेश के लिए लाइन में लग गए। यहाँ भी मुफ्त वाई फाई की सुविधा थी। इसका लाभ उठाते हुए हमने व्हाट्सएप वीडियो कॉलिंग के माध्यम से घरवालों और अपने ऑफिस के साथियों कृष्णा शुक्ला, दुष्यंत मिश्र व अमित यादव के लिए सीधा प्रसारण शुरू कर दिया।  विश्व में सर्वाधिक दर्शक इसी संग्रहालय को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक संग्रहालय में प्रागैतिहासिक काल से लेकर उन्नीसवीं सदी तक की वस्तुएँ संग्रहीत हैं। 
                                 
पेरिस के लूव्र संग्रहालय में रखी विश्व की सबसे चर्चित कलाकृति मोनालिसा
यहाँ एक बात देख कर अच्छा लगा कि  स्वागत डेस्क पर संग्रहालय की जानकारी देने वाले पत्रक में अपनी हिंदी भी शामिल है। और एक खास बात यह कि इस अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय में मूर्तियों और कलाकृतियों की जानकारी के लिए जो पट्टिका लगी है, वह सिर्फ फ्रेंच भाषा मे है। अंग्रेजी का नामनिशान नही। दरअसल फ्रांसीसी अपनी भाषा से बहुत प्यार करते हैं। इस लिए अंग्रेजी से बहुत दूरी बना कर रखी है। सोच कर दुख हुआ एक हमारा देश है अंग्रेजी के लिए पागल। अपनी भाषा का कोई सम्मान नही। वैसे तो इस संग्रहालय में देखने लायक काफी कुछ था पर हमारी रूचि "मोनालिसा" में ज्यादा थी। हम भी खोजते पूछते मोनालिसा तक पहुच गए। वहाँ मोनालिसा की तस्वीर के साथ तस्वीर निकालने के लिए भारी भीड़ थी। किसी तरह हमने भी जगह बनाई और ‘मोनालिसा मैडम’ के साथ तस्वीर खिंचा ली। मोनालिसा लिओनार्दो दा विंची द्वारा बनाई गई एक विश्व प्रसिद्ध चित्र है। यह एक विचारमग्न स्त्री का चित्रण है जो अत्यन्त हल्की मुस्कान लिये हुए हैं। यह संसार की सम्भवत: सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग है जो पेंटिंग और दृष्य कला की पर्याय मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इटली के चित्रकार लियोनार्दो दा विंची ने मोनालीज़ा नामक यह तस्वीर 1503 से 1506 के बीच बनाई थी। ये तस्वीर फ्लोरेंस के एक गुमनाम से व्यापारी 'फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो' की पत्नी  'लीज़ा घेरार्दिनी' को देखकर बनाई गई है। फिलहाल यह तस्वीर फ्रांस के लूव्र संग्रहालय में रखी हुई है। संग्रहालय के इस क्षेत्र में 16वीं शताब्दी की इतालवी चित्रकला की कृतियाँ रखी गई हैं। मोनालिसा की असल पेंटिंग केवल 21 इंच लंबी और 30 इंच चौड़ी है। तस्वीर को बचाए रखने के लिए यह एक ख़ास किस्म के शीशे के पीछे रखी गई है जो ना तो चमकता है और ना टूटता है। 
                            
यह संग्रहालय इतना बड़ा है कि घूमते घूमते थक चुके थे पैर जवाब दे रहे थे पर इस खूबसूरत संग्रहालय को पूरी तरह देखने का लालच भी मन में बना हुआ था। कुछ खाने पीने के बाद शाम तक संग्रहालय का दीदार करते रहे। अब होटल लौटने का समय हो गया था। यह म्यूजियम Louvre Rivoli मेट्रो स्टेशन से जुड़ा हुआ है। इस लिए कुछ कदमो की चहल कदमी के बाद हम प्लेटफार्म पर थे। अगली सुबह हमे पेरिस को अलविदा कह लंदन के लिए रवाना होना था। (जारी) 




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