मेरी यूरोप यात्रा-1 MY Europe Travel
यूरोपीय वीजा के लिए करनी पड़ी बड़ी मशक्कत
विजय सिंह कौशिक
पिछले साल ही लंबे इंतजार के बाद मेरी पहली विदेश यात्रा का मुहूर्त निकला था। इस बीच नीदरलैंड्स में रहने वाले मेरे मित्र लुइस छेड़ी जी का यूरोप आने का आमंत्रण मिलता रहता था। व्हाट्सएप के माध्यम से हमारी बातचीत होती रहती है। इस साल के शुरुआत में लुइस भाई का व्हाट्सएप कॉल आया। उन्होंने कहा कि मई में भांजे की शादी है और उसके बाद रिसेप्शन, आ जाओ। भारतीय मूल के लुइस छेदी के पूर्वज करीब 140 साल पहले यूपी से सूरीनाम गए थे। सूरीनाम हॉलैंड ( अब नीदरलैंड) का उपनिवेश था। इस लिए सूरीनाम के लोगों को हॉलैंड की नागरिकता मिल गई। आज करीब ढाई लाख सुरीनामी भारतीय ( इन्हें वहां सुरीनामी इंडियन कहते हैं) नीदरलैंड में रहते हैं। नीदरलैंड के सुरीनामी इंडियन आज भी अपनी भाषा संस्कृति को बचाये रखा है। वे डच भाषा के साथ अवधि- भोजपुरी भी बोलते हैं। भाषा ही वह माध्यम था जिसकी वजह से हमारी मित्रता प्रगाढ़ हुई। लुइस भाई से आदित्य दुबे ( नवभारत के डिप्टी चीफ रिपोर्टर ), राजकुमार सिंह ( प्रमुख संवाददाता), सोनू श्रीवास्तव ( एशियन एज) और मेरी मुलाकात छत्तीसगढ़ के औषधी खेती के लिए प्रसिद्ध किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी जी के घर पर हुई थी। लुइस भाई ने व्हाट्सएप पर शादी का निमंत्रण भेज दिया तो हमने भी यूरोप यात्रा करने की ठान ही ली। हम तीनों के साथ हमारे एक और पत्रकार मित्र दिनेश सिंह ( हमारा महानगर) ने भी साथ चलने की इच्छा जताई। इस तरह हम चार लुइस भाई के घर पहुचने की तैयारी में जुट गए।
जनवरी 2018 में मुंबई से एम्सटरडम हवाई यात्रा का टिकट निकलने के बाद मैंने देखा कि वे सभी देश नीदरलैंड के आसपास 400 से 500 किलोमीटर के दायरे में हैं, जिनके नाम हम बचपन से सुनते रहे हैं। दुनिया की फैशन राजधानी पेरिस, जर्मनी, बेल्जियम और लंदन। यूरोपीय यूनियन के 26 देशों में एक ही मुद्रा यूरो और एक ही वीजा चलता है, जिसे शेनजेन वीसा के नाम से जानते हैं। हर साल गर्मियों में बड़ी संख्या में भारतीय पर्यटक यूरोप की यात्रा करते हैं। पर नीदरलैंड से सिर्फ 450 किलोमीटर दूर स्थित लंदन के लिए अलग से यूके वीजा लेना पड़ता है। इस यात्रा से पहले हमें यह नही पता था कि वीजा हासिल करना कितना मशक्कत वाला काम है। जनवरी में टिकट निकलने के बाद मैंने सांताक्रुज पूर्व के उस ट्रेवेल एजेंट से वीजा के लिए संपर्क किया, जिससे मैने थाईलैंड का वीजा लिया था। पर थाईलैंड का वीजा काफी आसान होता है। वहां वीजा ऑन अराइवल की सुविधा के कारण पहले से वीसा लेने की जरूरत भी नही होती। हमारे ट्रेवेल्स एजेंट तुषार मेहता ने बताया कि यूरोप का वीजा हासिल करना मुश्किल होता है। इस लिए पहले यूके वीजा के लिए आवेदन करो, यूके वीजा मिल गया तो शेनजेन वीजा मिलना आसान हो जाएगा। उन्होने बताया की वीसा के लिए मार्च में आवेदन करना है।
ट्रैवल्स एजेंट तुषार के अनुसार यूके वीजा के लिए उन्हें यह विश्वास दिलाना जरूरी होगा कि आप लोगों के पास भारत मे रोजगार है और आप लोग लंदन में अवैध रूप से बसने का कोई इरादा नही रखते। इसके लिए ऑफिस से छुट्टी की मंजूरी के पत्र, पे स्लिप के साथ, प्रॉपर्टी के कागजात, बच्चों की बर्थ सर्टिफिकेट के साथ ही अच्छा बैंक बैलेंस भी दिखाना होगा। और सबसे जरूरी लंदन जाने के लिए आप के पास वहाँ रहने वाले किसी व्यक्ति का स्पांसर लेटर होना चाहिए। जो यह लिखकर दे कि फला व्यक्ति हमारे घर पर अतिथि के तौर पर आ रहे हैं और इनके यहाँ रहने की व्यवस्था मेरी जिम्मेदारी होगी। कुछ महीनों पहले मुंबई में हमारे एक मित्र के माध्यम से लंदन के पास लूटन में रहने वाले विनोद भाई शाह से हमारी मुलाकात हुई थी। पहली ही मुलाकात में वे हमें अच्छे लगे थे। मृदुभाषी और व्यवहार कुशल। अब स्पांसर लेटर के लिए हमे विनोद भाई की याद आई। हमने उन्हें यह बात बताई और अगले ही दिन उन्होंने हम चारों के लिए अलग-अलग स्पांसर लेटर ईमेल कर दिया। वीजा के लिए यह भी महत्वपूर्ण होता है कि आप का स्पांसर क्या करता है। विनोद भाई की अपनी सीए फर्म है। मूलरूप से जामनगर में रहने वाले विनोद भाई ने न सिर्फ स्पांसर लेटर भेजा साथ ही लंदन यात्रा के दौरान अपने घर पर रहने के लिए आमंत्रित भी किया। अब हमें लंदन में रहने का ठिकाना भी मिल चुका था।
अब सभी पत्रकारों का बैंक बैलेंस बहुत अच्छा तो होता नही। पर वीजा की जरूरत थी इस लिए हम बैंक बैलेंस मजबूत करने में जुट गए। परिवार के अन्य सदस्यों से कुछ पैसे उधार लेकर चेक अपने खाते के हवाले किये। संपादक जी से अवकाश स्वीकृति पत्र भी ले लिया। सारे कागजात जमा कर 10 मार्च 2018 को हम तुषार मेहता के ऑफिस पहुँच गए। उन्होंने फार्म पर हमारी सारी डिटेल भर वीजा फीस के 11-11 हजार रुपये लिए और वीएफएस से वीजा के लिए अपाउंटमेंट की तारीख मिलने का इंतजार करने को कहा। दरअसल लगभग सारे देशों ने अपनी वीजा प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी एक निजी ग्लोबल कंपनी वीएफएस को सौप रखी है। यह एजेंसी सारी प्रक्रिया पूरी कर आप के पासपोर्ट पर वीजा की मुहर लगाने के लिए संबंधित एम्बेसी में भेज देती है। वीजा देना-न देना उस एम्बेसी पर निर्भर होता है। दूसरे दिन ही तुषार का कॉल आया कि बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स स्थित वीएफएस के ऑफिस में वीजा इंटरव्यू और कागजात जमा करने जाना है। उन्होंने हमारा अपाउंटमेंट लेटर भी ईमेल कर दिया। तय समय पर हम बीकेसी पहुचे और अपनी बारी आने पर अपने सभी ओरिजिनल कागजात जमा कर उंगलियों की छाप देने के साथ ही फ़ोटो खिंचा ली। हम साथ मे अपनी पासपोर्ट साइज फ़ोटो भी ले गए थे पर वह काम नही आई। हमारी फ़ोटो वही खिंची गई। अब वीजा के लिए इंतज़ार करना था। पर यह इंतज़ार लंबा होता गया। हमे यूके से ज्यादा नीदरलैंड के वीजा की ज्यादा जरूरत थी क्योंकि हमारा आना जाना नीदरलैंड से ही था और नीदरलैंड वीसा मिलने पर हम आसपास के कई देशों की यात्रा कर सकते थे।
यूके वीजा के लिए लंबा इंतजार
लंदन:, यह दुनिया का वह शहर है, जहा जाने के बारे में मैं बचपन से सोचता था। यह मेरे सपनों का शहर है। क्योंकि इतिहास में रुचि होने के कारण स्कूली दिनों से ही इस शहर से परिचय हुआ था। अंग्रेजो ने लगभग 200 सालो तक इस हमारे देश पर राज किया। इस दौरान भारत भूमि के अहम फैसले लंदन में ही होते रहे। लंदन एक ऐसा शहर है जिसे इस देश के गांव-गिराव में रहने वाला हर आदमी जानता है। मेरा बचपन का सपना पूरा होने वाला था। लगभग एक माह के इंतज़ार के बाद वीएफएस से एसएमएस आया कि अपना पासपोर्ट कलेक्ट कर लें। उस दिन मैं महाबलेश्वर में था। इस लिए आदित्य जी, राजकुमार जी और दिनेश जी ने जाकर अपना पासपोर्ट और वीजा के लिए जमा किए गए कागजात वापस ले लिए। पासपोर्ट पर यूके वीजा की मुहर लग गई थी, यानी हमे लंदन जाने की अनुमति मिल चुकी थी।
खटाई में पड़ी यात्रा
सरे दिन महाबलेश्वर से लौट कर मैने भी अपना पासपोर्ट कलेक्ट किया। पर यूके वीसा के चक्कर मे हमारा काफी समय बर्बाद हो चुका था। जबकि नीदरलैंड वीजा के लिए अभी तक हम आवेदन नही कर पाए थे क्योंकि अबतक हमारा पासपोर्ट तो यूके एम्बेसी में पड़ा था। अब पासपोर्ट हमे यूके एम्बेसी से वापस मिल चुका था। इस बीच लुइस भाई ने वीजा के लिए स्पांसर लेटर भेज दिया था। इस लिए नीदरलैंड वीसा के लिए हम फिर से अपने ट्रेवल्स एजेंट तुषार मेहता के पास पहुँचे। फिर से सारे कागजात और वीजा फीस तुषार को जमा कर घर लौट आये। पर दूसरे दिन पता चला कि समय बहुत कम बचा है, इस लिए नीदरलैंड वीजा के लिए अपाउंटमेंट मिलना मुश्किल है। हमारी टिकट 12 मई की थी और नीदरलैंड वीजा के लिए हमे अपाउंटमेंट मिल रहा था 6 मई का। ट्रैवेल्स एजेंट की गलत सलाह के चलते हमारी यूरोप यात्रा खटाई में पड़ चुकी थी। अब यूके वीजा का हमारे लिए कोई मोल नही था। क्योंकि नीदरलैंड पहुँचते तब तो लंदन जाते। हमारा रास्ता नीदरलैंड से पेरिस और पेरिस से लंदन का था। इस बीच मेक माय ट्रिप से मैंने एम्सटरडम ( नीदरलैंड) से पेरिस जाने के लिए फ्लाइट की टिकट ( 3400 रुपए में) निकाल ली थी। यूरोप के एक देश से दूसरे देश की यात्रा विमान के अलावा बस और ट्रेन से भी की जा सकती है। हमने ट्रेन से ही पेरिस जाने की सोची पर यह देख कर आश्चर्य हुआ कि यूरोप में ट्रेन यात्रा हवाई यात्रा से दोगुनी महँगी है यानि किराए के मामले में भारत से उल्टा मामला।
अब हमने दिनेश जी के एक परिचित ट्रेवल्स एजेंट के पास पहुँचे और नीदरलैंड वीजा दिलाने का निवेदन किया। उन्होंने कुछ ज्यादा फीस लेकर जल्द अपाउंटमेंट दिलाने की बात कही। इसके लिए हम सहर्ष तैयार हो गए। हमने उन्हें अपने कागजात दिखाए तो उन्होंने बताया कि यह स्पांसर लेटर नही चलेगा। उन्होंने हमें एक फॉर्म ईमेल किया। बोले इस फार्म पर उस म्युनिसिपल कारपोरेशन के अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर चाहिए, जहाँ आप लोग जा रहे हो। नीदरलैंड की वह म्युनिसिपल कारपोरेशन आप के मेजवान से कुछ फीस वसूलने के बाद इस फार्म को अटेस्ट करेगी। यानी आप अपने मित्र के घर कुछ दिन रह सकते हो, इसकी अनुमति संबंधित नगरपालिका देगी। मैंने वह पत्र लुइस भाई को ईमेल कर सारी बात बताई। उन्होंने यह काम अपने भांजे विजय पंचम जी को सौप दिया। विजय जी नीदरलैंड सरकार में कार्यरत हैं। इस बीच हमे नीदरलैंड वीजा के लिए 24 अप्रैल का अपाउंटमेंट भी मिल गया था। विजय पंचम ने स्पांसर लेटर के लिए संबंधित म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन से संपर्क किया तो वहाँ से एक सप्ताह बाद का समय मिला। विजय पंचम जी ने मुझे यह बात बताई तो मैंने उन्हें बताया कि दो दिनों बाद का हमारा नीदरलैंड वीजा के लिए अपाउंटमेंट है और बगैर उस लेटर के काम नही होगा। यात्रा एक बार फिर खटाई में पड़ चुकी थी।
हमारे निवेदन पर विजय पंचम जी ने नीदरलैंड के संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर हमारे यात्रा तिथि में बहुत कम समय होने की बात बताई तो वे तुरंत लेटर देने को तैयार हो गए। अगले दिन ही हमे ईमेल से वह पत्र मिल गया और हम महालक्ष्मी स्थित वीएफएस के कार्यालय में नीदरलैंड वीजा के लिए सारी प्रक्रिया पूरी कर आये। वहां वीजा के लिए भारी भीड़ जुटी थी। जिससे पता चलता था कि विदेश यात्रा में भारतीय भी पिछे नहीं हैं। वीएफएस अधिकारियों ने बताया कि इस बार उम्मीद से अधिक वीजा आवेदन आये हैं। इस लिए 30 दिन के पहले वीजा मिलना मुश्किल है। जबकि हमारी यात्रा तिथि में 17 दिन ही बचे थे। हमारे पास चांस लेने के अलावा कोई विकल्प नही था। एक सप्ताह बाद पासपोर्ट का इंतज़ार शुरू जो गया। यात्रा की तिथि दिन प्रतिदिन समीप आ रही थी पर हमारे पास हमारे पासपोर्ट नही थे। 11 मई, शुक्रवार की रात 2.40 बजे की हमारी फ्लाइट थी और 8 मई तक पासपोर्ट दिल्ली से नही लौटा था। अब हमने 9 मई के दोपहर तक इंतजार के बाद लुइस भाई को बता दिया की हम नही आ पा रहे। टिकट भी रद्द करने को बोल दिया। तभी शाम करीब 5 बजे आदित्य जी का कॉल आया कि वीएफएस से मैसेज आया है कि आप का पासपोर्ट दिल्ली से रवाना हो चुका है। तुरंत टिकट रद्दीकरण रोकने को बोला और कुरियर कंपनी से संपर्क किया तो पता चला कि पासपोर्ट शनिवार की सुबह तक डिलीवर होंगे। यह क्या हमारी फ्लाइट तो शुक्रवार की रात की है और पासपोर्ट मिलेगा शनिवार की सुबह। फिर यात्रा खटाई में.....
संयोग से दिनेश जी का एक मित्र उसी कुरियर कंपनी में काम करता है। उन्होंने उससे संपर्क कर अपनी समस्या बताई। मित्र ने मदद की और 10 मई की शाम 7 बजे पासपोर्ट मेरे घर पर पहुँच गया। अब हमारे पास 11 मई को दिनभर का समय था और एक महत्वपूर्ण काम और बाकी था, विदेशी मुद्रा का इंतज़ाम। पिछली बार थाईलैंड यात्रा के दौरान मैंने एयरपोर्ट पर मनी एक्सचेंज कराया था कम रेट की वजह से नुकसान उठाना पड़ा था। इस लिए इस बार अपने परिचित पूरव शाह की मनी एक्सचेंज फर्म से मनी एक्सचेंज कराने के लिए सम्पर्क किया। पूरव ने बताया कि इस सरकार की सख्ती की वजह से कैश नहीं बल्कि बैंक से पैसे मेरे खाते में ट्रांसफर करने पड़ेंगे। हमने वैसा ही किया अपने बैंक खाते से पैसे उनके फर्म के खाते में भेज दिए। पूरव ने हमें कुछ कैश बाकी फोरेक्स कार्ड में यूरो मुद्रा अपलोड कर दे दी। सुरक्षा के लिहाज से विदेश यात्रा के दौरान फोरेक्स प्रीपेड कार्ड रखना अच्छा होता है। यूरोप में हर जगह डिजिटल लेनदेन होता है। इस लिए हमें इस कार्ड के इस्तेमाल में कोई परेशानी नहीं हुई। यूरोप में हर जगह भारतीय भोजन मिलने में परेशानी की बाबत हमनें सुन रखा था। इस लिए 5-5 किलो फरसाण-नमकीन आदि भी खरीद लिए। अब यात्रा में कुछ ही घंटे बचे थे। रात 2.40 बजे की फ्लाईट थी। इस लिए हम रात 11.30 बजे तक छत्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, अंधेरी पहुंच गए। यह मेरी दूसरी और मेरे तीनों साथियों की पहली विदेश यात्रा थी। इमीग्रेशन की जांच-पड़ताल के बाद रात 2.15 बजे तक हम जेट एयरवेज के विमान में पहुंच गए थे। 9 घंटे का समय व्यतित करना था। अच्छा यह था कि सीट के सामने लगी स्क्रिन में कुछ हिंदी फिल्में भी सेव थी। हालांकि वे सारी फिल्में मेरी देखी हुई थी। लेकिन रात काटने के लिए इन्ही का सहारा था। विमान में हम चारों को अलग-अलग सीटे एलाट हुई थी। लेकिन ट्रेनों में सीटों की अदला-बदली का अनुभव हमारे था ही। यह अनुभाव हवाई जहाज में भी काम आया और एक अंग्रेज से निवेदन कर दिनेश जी और मैंने अपनी सीट एक जगह कर ली। राजकुमार जी और आदित्य जी को पहले से ही एक साथ सीटे मिली हुई थी। सुबह 8 बजे हमारा विमान एम्सटरडम के सिचीपोल हवाई अड्डे पर पहुंचने वाला था। लुईस भाई ने बता दिया था कि एयरपोर्ट के बाहर मैं मौजूद रहुंगा। भारत और नीदरलैंड के समय में करीब चार घंटे का अंतर है। (जारी)
( लेखक दैनिक भास्कर, मुंबई के प्रमुख संवाददाता हैं)


Comments