मेरी यूरोप यात्रा-6 एफिल टॉवर से पेरिस का दीदार

                    

                        एफिल टॉवर से पेरिस का दीदार 

पेरिस में एंफिल टॉवर के सामने सहयात्री आदित्य दुबे, दिनेश सिंह और मैं (विजय सिंह कौशिक)
                                                       
                                                             विजय सिंह कौशिक 

पेरिस  घूमने के लिए हमारे पास सिर्फ 3 दिन का समय था। इस लिए जिस दिन पेरिस पहुंचे ( 15 मई 2018) उसी दिन एफ़िल टावर जाने के लिए होटल से निकल लिए। हमारा होटल ला-चैपेल मेट्रो स्टेशन के बिल्कुल करीब था। होटल के रिशेप्सन पर पहुँच कर हमने होटल के कर्मचारी जॉन से  एफ़िल टॉवर जाने की इच्छा जताई तो उन्होंने हमें मार्क कर के शहर का नक्शा पकड़ा दिया। उन्होंने ला चैपेल से मेट्रो ट्रेन पकड़ कर एफ़िल टॉवर पहुचने का रास्ता अच्छी तरह समझा दिया। स्टेशन पहुँच कर राजकुमार जी टिकट खिड़की पर टिकट लेने गए तो एक भारतीय लड़की बुकिंग क्लर्क की सीट पर बैठी दिखाई दी। फ्रांस के मेट्रो रेल में एक भारतीय कर्मचारी को देख कर हमें खुशी हुई। राजकुमार जी ने उससे बातचीत की तो पता चला कि वह फ्रांस में ही पैदा हुई है। उसके पिता मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं। उसने भी हमे एफ़िल टॉवर पहुचाने का पता फिर से समझा दिया। कुछ मिनटों की यात्रा के बाद हम उस स्टेशन पर उतर चुके थे जहाँ से  एफ़िल टॉवर नज़र आ रहा था। थोड़ी सी पदयात्रा के बाद हम चारों  एफ़िल टॉवर पहुँच गए थे। भीतर जाने के लिए लंबी लाइन लगी थी। सुरक्षा जांच के बाद भीतर जाना था।
एंफिल टॉवर से पेरिस शहर का नाजारा

 दुनिया के सबसे चर्चित निर्माणों से एक पेरिस के एफिल टावर को देखने हर साल लाखों लोग पहुँचते हैं। पेरिस शहर की खूबसूरती सही मायनों में एफिल टॉवर से ही दिखाई देती है। हम भी 2000 रुपये का टिकट खरीद कर एफिल टावर के टॉप पर पहुचे।  एफ़िल टॉवर की सैर के लिए तीन विकल्प हैं। पहली मंजिल तक पैदल जाना, दूसरी मंजिल तक लिफ्ट से या फिर टॉवर के टॉप पर। यहाँ से शहर का खूबसूरत नजारा देखने लायक था। एफिल टॉवर का निर्माण 1887 से 1889 के दौरान  सीन नदी के तट पर किया गया था।  यह टॉवर विश्व में उल्लेखनीय निर्माणों में से एक और फ़्रांस की संस्कृति का प्रतीक है। एफ़िल टॉवर की रचना गुस्ताव एफ़िल के द्वारा की गई है और उन्हीं के नाम पर से एफ़िल टॉवर का नामकरण हुआ है। एफ़िल टॉवर की रचना 1889 के वैश्विक मेले के लिए की गई थी। जब एफ़िल टॉवर का निर्माण हुआ उस वक़्त वह दुनिया का सबसे ऊँचा निर्माण था । टॉवर की ऊँचाई 324 मीटर है, जो की पारंपरिक 81 मंज़िला इमारत की ऊँचाई के बराबर है। एफ़िल टॉवर की यात्रा के दौरान हमारे सह यात्री नवभारत टाइम्स के प्रमुख संवाददाता राजकुमार सिंह जी ने हमारी कई खूबसूरत तस्वीरे निकाली। इस पूरी यात्रा में फोटोग्राफी उन्ही के सौजन्य से हुई। फोटोग्राफी एक कला है, वे इस कला में सिद्धहस्त हो चुके हैं। एफ़िल टॉवर की लिफ्ट भी पकड़ने के लिए भी लंबी लाइन लगी थी जिसमे अधिकांश भारतीय ही दिखाई दे रहे थे। एफ़िल टॉवर के टॉप पर पहुचाने के लिए सीधी लिफ्ट नहीं है। पहली लिफ्ट दूसरी मंजिल तक पहुचायेगी। वहाँ से एक अन्य लिफ्ट पकड़ कर अंतिम मंजिल तक पहुँच सकते हैं। दूसरी मंजिल पर भी टॉप पर जाने वाली लिफ्ट पकड़ने के लिए लाइन लगी थी। कुछ समय के इंतज़ार के बाद हम अंतिम मंजिल वाली लिफ्ट में सवार हो सके।
एंफिल टॉवर से पेरिस की सीन नदीं कुछ यूं दिखाई देती है
एफिल टॉवर के टॉप पर भी अच्छी खासी भीड़ थी। हर तरफ भारतीय पर्यटक ही दिखाई दे रहे थे। वहाँ से पेरिस शहर की खूबसूरती के असली दर्शन हो रहे थे। इस शहर की सबसी बड़ी विशेषता यह लगी कि पूरा शहर हेरिटेज हैं। शहर को देख कर लगता है वहाँ नवनिर्माण की इजाज़त नहीं हैं। पूरे शहर में कही भी हमे काँचवाली नई इमारत नहीं दिखाई दी। पूरे शहर में प्राचीन इमारते ही हैं पर उनका रखरखाव इतना अच्छा है कि सैकड़ो साल पुरानी इमारतों की चमक आज भी बरकरार है। एफ़िल टॉवर के बगल से बहने वाली सीन नदी का नज़ारा भी लाजवाब था। नदी में चल रहे बड़े-बड़े बोट में सैलानी सवार थे। 
सीन नदी पर नाव में सवार होकर फोटोग्राफी में तल्लीन राजकुमार सिंह
एफ़िल टॉवर से उतर कर हमें भी सीन नदी की सैर करनी थी। तब तक शाम के 7 बज चुके थे लेकिन यूरोप में शाम 7 बजे भी धूम खिली रहती है। 9 बजे के बाद ही रात्रि के दर्शन होते हैं। एफिल टॉवर को अलविदा कह हम नदी के तट पर पहुंच गए। सीन नदी की यात्रा के लिए बोट का टिकट खरीदा और बोट की छत पर सवार हो गए। यूरोप में नदियों को बड़े जतन से सहेजा गया है और नदियां यहां पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं। सीन नदी के दोनों तरफ पत्थर के सुंदर परकोटे बने हैं। हमनें एक घंटे में जहां तक यात्रा की, पूरी नदी के दोनों किनारे पत्थरों से सुसज्जित हैं। इन्हीं पत्थरों पर बैठ कर लोग अपनी शामें रंगीन करते दिखाई दे रहे हैं। हर तरफ लड़के-लड़कियां बीयर की बोतलों के साथ महफिल जमाए हुए हैं। वे बोट पर सवार पर्यटकों का अभिवादन भी करते रहते हैं। बोट किनारे लौटी तब तक धीरे-धीरे रात घिरने लगी थी साथ ही ठंढ भी बढ़ रही थी। बोट से उतर कर हम मेट्रो स्टेशन की तरफ बढ़े। पेरिस में पहले दिन का हमने अच्छा सदुपयोग किया था। अब होटल की तरफ लौटना था। दूसरे दिन हमनें खास तौर से पर्यटकों के लिए चलाई जाने वाली बस की सवारी करना तय किया था। यह बस पूरे शहर भर में घूमाती है। (जारी) 


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