मेरी यूरोप यात्रा- 5 / Meri Europe Yatara



 अद्भत सौंदर्य वाला शहर पेरिस


                    विजय सिंह ‘कौशिक’ 

पेरिस का लिटल इंडिया कहा जाने वाला इलाका 
                  पेरिस.....दुनिया की फैशन राजधानी। बचपन से जिन शहरों के बारे में जानता था, पेरिस उनमे से एक है।  टीवी पर "इवनिंग इन पेरिस" फिल्म भी देखी थी। नीदरलैंड में रहने वाले अपने मित्र लुईस छेदी के घर कि यात्रा का कार्यक्रम बनने पर जब पता चला कि नीदरलैंड से पेरिस मात्र  500 किलोमीटर दूर है तो हमने इस फेमस शहर का दीदार करने की भी योजना बना डाली। इस लिए भी वहाँ जाने की सोची क्योकि पेरिस में मेरी एक परिचित सुप्रसिद्ध चित्रकार सुजाता बजाज जी भी रहती हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जमुनालाल बजाज जी के परिवार की सुजाता बजाज जी से मेरी मुलाकात मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई थी। नीदरलैंड से पेरिस जाने के लिए विमान का टिकट हमने चार महीने पहले ही निकाल लिए थे। 3200 भारतीय रुपए में यह टिकट मिल गया था। होटल की बुकिंग भी करवा ली थी और सुजाता जी को अपने पेरिस आने की सूचना भी दे दी थी। 15 मई 2018 की सुबह एम्सटरडम हवाई अड्डे से पेरिस के लिए रवाना होना था। हाल केे वर्षो में यूूरोपिय देशों में फ्रांस में कानून व्यवस्था की स्थित खराब हुई है। पेरिस आतंकियों के निशाने पर रहा है। वहाँ जाने से पहले कई लोग आगाह कर चुके थे। इंटरनेट पर भी पेरिस में पर्यटन को लेकर सुखद जानकारी नहीं थी। हमारे वहां पहुचाने के दो दिन पहले ही  हमले में एक युवक की हत्या की खबर भारत से कई साथी पत्रकार व्हाट्सएप पर भेज चुके थे। फिर भी हम पेरिस जाने के अपने निर्णय पर कायम रहे। 
                             पेरिस रवाना होने के लिए 15 मई की सुबह हम अपने नीदरलैंड के अपने मित्र लुइस भाई के साथ एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। आज कुछ ट्रैफिक ज्यादा था। करीब 50 मिनट में हम एम्सटरडम के सिफ़ोल एयरपोर्ट पर पहुँच चुके थे। सुरक्षा जांच आदि औपचारिकता पूरी कर हम ट्रांससेविया फ्रांस एयरलाईन के विमान में सवार हो चुके थे। सुबह 9.45 बजे की फ्लाइट 1 घंटे 25 मिनट बाद सुबह 11.10 बजे पेरिस एयरपोर्ट पर पहुंच गई। यह एयरपोर्ट काफी पुराना है। इस लिए हमारे मुंबई और एम्सटरडम एयरपोर्ट जैसी चमक धमक यहाँ नहीं दिखी। 


पेरिस के सेंट डेनिस में दुकानों में भारतीय फल व पत्रिकाएं

हमारा होटल पेरिस के लिटिल इंडिया कहे जाने वाले सेंट डेनिस में था। अपना सामान लेने के बाद अब हमें होटल तक जाने के लिए टैक्सी की तलाश थी। पेरिस के बारे में हमने जो कुछ सुना था, इसकी वजह से इस शहर को लेकर हमारे मन मे एक भय सा था। पहले हमने प्रीपेड टैक्सी की तलाश की पर वहाँ यह सुविधा नही थी। एयरपोर्ट के बाहर आये तो अधिकांश टैक्सी चालक अफ्रीकी मूल के दिखाई दिए। हम कुछ समय खड़े रहे। इसी बीच एक गोरे टैक्सी चालक ने हमसे टैक्सी के लिए पूछा तो हमने उसे मोबाइल पर अपने होटल का पता दिखाया। वह हमें वहां छोड़ने को तैयार था। उसकी टैक्सी में सवार होकर होटल की तरफ चल दिये। टोयटा कंपनी की उसकी कार बेहद आरामदायक थी। वहाँ टैक्सी में भी लक्जरी कारे चलती हैं। टैक्सी चालक मूलरूप से अल्जीरिया का रहने वाला था। अफ्रीकी देश अल्जीरिया फ्रांस का उपनिवेश रहा है। इस लिए अल्जीरिया के लोगों को फ्रांस की नागरिकता मिल गई है। पेरिस में बड़ी संख्या में दूसरे देशों के लोग रहते हैं। टैक्सी चालक हमारे देश भारत के बारे में बस इतना जनता था कि महात्मा गांधी उस देश के थे। करीब आधे घंटे की यात्रा के बाद हम होटल पहुंच चुके थे।हमने टैक्सी वाले को 35 यूरो बतौर किराय भुगतान किया। यहाँ पहुच कर ऐसा लगा कि हम भारत के किसी शहर में पहुंच गए हैं। 
                        हमारे होटल के ठीक सामने की दुकान के शोकेस में साड़िया सजी थी। बगल की दुकान में आम केला आलू आदि भारतीय फल और सब्जी बिक रहे थे। दुकानों में साड़ी से लेकर टमाटर गोभी सब उपलब्ध था। केसर आम 400 रुपये किलो और केला भी 500 रुपये में एक किलो बिक रहा था। हमने भारत से तुलना की तो बहुत महंगा लगा। स्टोर में हिंदी समाचार पत्रिका इंडिया टुडे हिंदी भी बिक रही थी। होटल के एक ही बड़े के कमरे में हम चारों लोगों को रहना था। तीन दिन के लिए इस होटल का किराया 22 हजार भारतीय रुपया था जिसका भुगतान पहले ही कर चुके थे। इसके बावजूद होटल के रिसेप्शन पर पहुंंचने पर हमें 20 यूूरो (1600 भारतीय रुपया) पर्यटन टैक्स के रुप में देना पड़ा। होटल वाले ने बताया कि यह पैसे सरकार पेरिस शहर के विकास के लिए खर्च करती है।  होटल के कमरे में सामान रखा। तब तक दोपहर के 1 बज चुके थे। भूख भी लग रही थी। भारतीय भोजन की तलाश में बाहर निकले तो हर तरफ इंडियन रेस्टोरेंट ही नज़र आ रहे थे। थोड़ी चहलकदमी के बाद समझ में आ गया कि यह पूरा दक्षिण भारतीयों और श्रीलंकाई तमिलों का इलाका है। एक भारतीय रेस्टोरेंट में खाना खाया। काउंटर पर बैठी लड़की से बातचीत करने पर पता चला जिसे हम भारतीय रेस्टोरेंट समझ कर खाना खाने आये थे दरसअल उसकी मालकिन श्रीलंकाई तमिल है। उसने हमें भारतीय भोजन दाल चावल सब्जी खिलाई पर उस में भारतीय टेस्ट नहीं था। खैर शाम के खाने के लिए फिर किसी ओरिजनल इंडियन रेस्टोरेंट की तलाश का फैसला लिया गया। 
                       
पेरिस के लिटिल इंडिया इलाके में एक भारतीय रेस्टोरेंट 
खाना खाने के बाद हमने इलाके में थोड़ी चहलकदमी की। सामने के स्टोर में भारतीय मसालों पूजा पाठ की सामग्री के साथ ही इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका बिकती देख अच्छा लगा। होटल पहुच कर मैंने सुजाता बजाज जी को कॉल कर पेरिस पहुँचने की सूचना दी। पेरिस में भी नीदरलैंड की तरह शाम में 10 बजे के बाद सूरज डूबता है। इस लिए अभी भी हमारे पास काफी समय था। सुजाता जी ने कहा कि आज एम्फिल टावर देख आओ। एम्फिल टावर जो दुनियाभर में पेरिस की पहचान है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मेरे पेरिस जाने से पहले ही मेरे घर मे एम्फिल टावर की प्रितिकृति मौजूद थी। अगले दिन सुजाता जी से मिलना था। उन्होंने हमें रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया था। इस लिए आज के समय के सदुपयोग के लिए एम्फिल टावर जाना तय हुआ। (जारी)


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