मेरी यूरोप यात्रा-3
दूर तक निगाह में गुल खिले हुए....
नीदरलैंड जाने से पहले कई लोगों ने वहाँ के क्यूकेनहॉफ का ट्यूलिप उद्यान का जिक्र किया था। यह ट्यूलिप गार्डन भारतीयों में इस लिए भी ज्यादा लोकप्रिय है क्योंकि अमिताभ बच्चन, रेखा और जया बच्चन के अभिनय से सजी फ़िल्म 'सिलसिला' का एक लोकप्रिय गीत 'देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए, दूर तक निगाह में थे गुल खिले हुए, ये गिला है आप की निगाहों का, फूल भी हो दरमियां तो फासले हुए...की शूटिंग यहीं हुई थी। इस फ़िल्म को मेरे मित्र मशहूर लेखक सागर सरहदी जी ने लिखा है और लता जी का गाया यह गीत आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। लुइस भाई ने बताया कि आप लोग भाग्यशाली हो कि एक दिन पहले आये। आज (13 मई 2018) ट्यूलिप गार्डन देखने का अंतिम दिन है। इसके बाद यह अगले सालभर के लिए बंद हो जाएगा।
लुइस भाई के साथ हम ट्यूलिप गार्डन के लिए रवाना हुए। रास्ते में हम पेट्रोल लेने के लिए एक पेट्रोल पम्प पर रुके। यहां पेट्रोल पंप पर बड़े-बड़े स्टोर भी होते हैं जहाँ से आप रोजमर्रा की चीज़ें खरीद सकते हैं। शौचालय की सुविधा तो होती ही है पर मुफ्त नही। शौचालय का दरवाजा खोलने के लिए 50 सेंट ( 40 भारतीय रुपये) की जरूरत पड़ती है। आदित्य जी ने 40 रुपये खर्च कर मूत्र विसर्जन किया। यूरोप में अधिकांश जगहों पर शौचालय के इस्तेमाल के लिए भुगतान करना पड़ता है। एक बार पेशाब करने के लिए 40 रुपये खर्च करना हमे भारी पड़ता था इस लिए हम मुफ्त वाले शौचालय खोजते रहते थे। जहाँ कही दिखे तो उसका इस्तेमाल जरूर करते। हालांकि यहाँ शौचालय बेहद साफ सुथरे रहते हैं, वह पैसे वाला हो या मुफ्त। सफाई के मामले में सभी बराबर।
अब हम ट्यूलिप गार्डन के सामने पहुँच चुके थे। बड़े से मैदान में हजारों वाहन खड़े थे। ट्यूलिप गार्डन का आज अंतिम दिन होने की बजह से पूरे यूरोप से लोग आए हुए थे। उस बड़े मैदान में दुनियाभर से आये वाहन खड़े थे। यूरोपीय यूनियन के सभी देशों में वाहनों का नंबर प्लेट एक जैसा होता है। उस देश की पहचान के लिए नंबर प्लेट के एक तरफ शार्ट फॉर्म में उस देश का नाम लिखा होता है। जैसे नीदरलैंड के लिए 'एनएल'। कार पार्क कर हम टिकट खिड़की के सामने पहुच गए। टिकट के लिए लाइन लगी हुई थी। मैं भी उसी लाइन में लग गया। 90 यूरो ( 7290 भारतीय रुपये) खर्च कर 5 टिकट खरीदा और पहुँच गए फूलो की रंग बिरंगी दुनिया में। भीतर बड़ी संख्या में भारतीय पर्यटक दिखाई दे रहे थे। लुइस भाई ने बताया कि फ़िल्म सिलसिला का हिट गाना देखा एक ख्याब तो .... की यहाँ शूटिंग के बाद भारतीय पर्यटकों का आकर्षण इस ट्यूलिप गार्डन के प्रति बढ़ा था जो आजतक कायम है। पर्यटन को बढ़ावा देने में फिल्मो का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। यह बात स्विट्जरलैंड-नीदरलैंड जैसे देशों को समझ आती है पर अपनी सरकार को नही। यूरोप में ही स्थित स्विट्जरलैंड में भारतीय पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा कारण यश चोपड़ा की फिल्में रही हैं। स्विट्जरलैंड सरकार इसके लिए दिवंगत यश जी को सम्मानित भी कर चुकी है। दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे के कई यादगार सीन स्विट्ज़रलैंड में ही फिल्माए गए थे। वहाँ की सरकार ने इस जगहों पर इस बात के उल्लेख वाले बोर्ड भी लगाए हैं। भारतीय पर्यटक उन स्थानों पर जाकर काजोल-शाहरुख के कटआउट के साथ तस्वीर निकाल कर खुश होते हैं।
खैर हम ट्यूलिप के बहुरंगे संसार में पहुँच गए थे। हमारे सह यात्री राजकुमार जी फ़ोटो निकालने के बड़े शौकीन हैं, वे तस्वीरे भी अच्छी निकालते हैं। फूलो की इन वादियों में हमने उनकी फ़ोटो सेवा का जमकर लुत्फ उठाया। गार्डन के भीतर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे थे। साथ ही विशेष रूप से सजी धजी कन्याओं के साथ तस्वीर खिंचाने का मौका भी मुफ्त में मिल रहा था। हमने भी इसका लाभ उठाया। तभी मैंने देखा राजकुमार जी एक महिला से बात कर रहे हैं। मैं भी पास में पहुच गया तो राजकुमार जी ने बताया कि ये जौनपुर की हैं। जौनपुर यानी मेरा व राजकुमार जी का गृह जिला। मैंनेे उस महिला से पूूछा क्या आप जौनपुर से हैं। उन्होंने जवाब दिया नहीं। मैं सूरानामी इंडियान हूं और इस गार्डन में पार्ट टाईम काम करती हूं। सूरीनामी इंडियन का उल्लेख मैं पहले ही कर चुका हूूं। नीदरलैंड में करीब ढाई लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जिनके पूर्वग करीब 145 साल पहले यूपी-बिहार से सुुरीनाम गए थे। ये लोग आज भी हिंदी-भोजपुरी बोलते हैं और अपने पूर्वजों के देश से लगाव रखते हैं। उस महिला ने बताया कि पिछले साल धार्मिक यात्रा पर हिंदुस्तान गई थी। दोपहर का समय हो चुुका था। हम भी विशाल परिसर में फैले गार्डन में घूम-घूम कर थक चुकेे थे। हल्की बारिश भी हो रही थी। जिससे ढंठ भी बढ़ गई थी।
आज लुईस भाई के छोटे भाई मून छेदी के यहां हमारी दावत थी। इस लिए हमने उस हिंदुस्तानी मूल की महिला से विदा लेकर डेनहॉक के लिए रवाना हुए। रोटेरडम के समीप स्थित इसी शहर में मून छेदी जी अपनी श्रीमति जी के साथ रहते है। यूरोप में सड़के बहुत अच्छी हैंं। कुछ ही समय में हम मून छेदी के घर पहुंच गए। दोनों भोजन तैयार कर हमारा ही इंतजार कर रहे थे। मून छेदी जी गीत-संगीत के शौकिन व्यक्ति हैं। घर में बालीलुड फिल्मों की सीडी-डीवीडी का अच्छा संग्रह बना रखा है। साथ ही म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट भी रखे हैं। खाने के बाद मून जी ने संगीत की महफिल सजाई। कीबोर्ड पर राग छेड़ा और कई हिंदी व भोजपुरी के सुपरहित गाने सुना डाले। धीरे-धीरे शाम हो रही थी और मौसम भी खराब हो रहा था। इस लिए हमने भी अपने ठिकाने पर लौटने की सोची और मून छेदी और उनकी श्रीमति जी से विदा लेकर लुईस भाई के घर की तरफ रवाना हुए। (जारी)








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