मेरी थाईलैंड यात्रा (1)




 पासपोर्ट को विदेश यात्रा कराने करना पड़ा लंबा इंतजार


                  विजय सिंह कौशिक 

मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर 
बात 15 साल पहले की है, जब मैंने एक न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर काम की शुरुआत की थी। एक दिन चैनल के  मालिक ने रिपोर्टरों के साथ बैठक ली और अचानक पूछा कि किस-किस के पास पासपोर्ट है ? दुबई चलना है। मेरे साथ वहां मौजूद हमारे किसी साथी के पास उस वक्त पासपोर्ट नहीं था। बस उसी दिन तय किया कि पासपोर्ट बनवाना है, न जाने कब विदेश जाने का मौका मिल जाए।
                       तब पासपोर्ट बनवाने के लिए आनलाईन आवेदन की सुविधा नहीं थी। संयोग से मेरी बिल्डिंग में रहने वाले एक सज्जन सावंत साहब पासपोर्ट आफिस में काम करते थे। दूसरे दिन ही मैं सावंत साहब को पकड़ लिया। बोला पासपोर्ट बनवाना है। अगले दिन ही सावंत साहब पासपोर्ट बनवाने के लिए फार्म ले आए। मैंने भी बड़े उत्साह के साथ फार्म भर कर जरूरी कागजात और फीस उनके हवाले कर दी। कुछ दिनों बाद पुलिस स्टेशन से संदेश आया कि पासपोर्ट वेरिफिकेशन के लिए आ जाओ। पुलिस स्टेशन पहुंच कर औपचारिकताएं पूरी की। कुछ दिनों के इंतजार के बाद पासपोर्ट मिल गया। पासपोर्ट तो हाथ में आ गया था लेकिन उसे विदेश यात्रा कराने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। 8 साल की नवभारत की नौकरी के दौरान एक बार एक पीआर एजेंसी से दुबई जाने का बुलावा आया पर न चाहते हुए भी मना करना पड़ा क्योंकि उसी वक्त घर में भतीजी की शादी थी। 
                     फरवरी, 2013 में नवभारत छोड़ दैनिक भास्कर पहुंचा। अप्रैल, 2013 में एक बार फिर दुबई जाने का न्यौता मिला। मसाला किंग के नाम से मशहूर धनंजय दातार का प्रोग्राम कवर करने के लिए दुबई जाना था। पुणे स्थित पीआर ऐजेंसी ने दुबई आने-जाने का एयर टिकट ईमेल से भेज दिया तो लगा अब मेरी पहली विदेश यात्रा का मुहुर्त निकल आया है। वीजा के लिए मैंने अपना पासपोर्ट पीआर ऐजेंसी वाली मैडम के हवाले कर दिया। इसी बीच उन मोहतरमा का मेरे मोबाईल पर फोन आया। पूछा क्या इसके पहले आप कभी दुबई गए हैं। मैंने कहा दुबई क्या हिंदुस्तान के बाहर पैर नहीं निकाल सका हूं। अगला सवाल मेरा था। क्या हुआ। उन्होंने जो बताया सुन कर मेरे होश उड़ गए। बताया कि दुबई दूतावास ने आप को वीजा देने से मना कर दिया है, क्योंकि आप पर वहां जाने पर आजीवन पाबंदी लगा दी गई है। मैं यह सोच कर परेशान कि आखिर जब मैं कभी दुबई गया ही नहीं तो वहां ऐसा क्या कर दिया कि आजीवन पाबंदी लगा दी। खैर मेरी पहली विदेश यात्रा खटाई में पड़ चुकी थी। और पत्रकार साथी तय तिथि पर दुबई के लिए उड़ान भर चुके थे और मैं आजीवन पाबंदी हटवाने के लिए दुबई दुतावास के चक्कर लगा रहा था। भले ही मैं दुबई नहीं जा सका था लेकिन मैं यह आजीवन पाबंदी वाली गुत्थी सुलझाना चाहता था। कई जगहों पर ईमेल भेजे। इसी दौरान एक दिन अपने वरिष्ठ साथी पत्रकार अकेला जी से मुलाकात हो गई। अकेला जी नवभारत में मेरे वरिष्ठ थे। उन दिनों वे अग्रेजी अखबार मिड-डे में कार्यरत थे। मैंने दुबई वीजा प्रकरण के बारे में उन्हें विस्तार से बताया कि किस तरह बगैर दुबई गए मुझ पर आजीवन पाबंदी लगा दी गई है। अगले दिन मिड-डे ने मेरी तस्वीर के साथ एक बड़ी खबर प्रकाशित की। ( http://www.mid-day.com/articles/dubai-bans-mumbai-journalist-who-has-never-travelled-abroad/210917)। अंग्रेजी अखबार में खबर प्रकाशित होने के बाद मामला दुबई सरकार तक पहुंचा। आखिर फिर से जांच-पड़ताल की गई और मुझे एक माह का वीजा दे दिया गया। हालांकि मैं इस वीजा का इस्तेमाल नहीं कर सका। क्योंकि वह ट्रिप पूरी हो चुकी थी।
                  घुमक्कडी स्वभाव का होने की वजह से मैं घुमने के मौके खोजता रहता हूं। पहली विदेश यात्रा का यह हश्र होने के बाद मैं जल्द से जल्द अपने पासपोर्ट पर इमीग्रेशन की मुहर लगवाना चाहता था। पर विदेश यात्रा का मुहुर्त निकल नहीं रहा था। चार साल बीत गए पर मेरी विदेश जाने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी। साल 2016 में तय किया कि कुछ भी हो जाए अब पासपोर्ट पर मुहर लगवानी ही है। इंटरनेट के माध्यम से सस्ते में विदेश यात्रा के बारे में जानकारी जुटाने लगा। इसके बाद कम से कम एक साथी की तलाश थी जो मेरे पहले विदेश यात्रा में सहयात्री बन सके। विदेश जाने की वास्तविक तैयारी मैंने मई (2017) से ही शुरू कर दी थी। सोच लिया था कोई सहयात्री नही मिला तो अकेले ही रवाना होंगे। इंटरनेट के माध्यम से कई अकेले दुनिया घूमने वालो के बारे में जानकर मेरा भी उत्साह बढ़ गया था। पहली विदेश यात्रा के लिए इंटरनेट से काफी जानकारी जुटाई। इस दौरान मैंने देखा कि इंटरनेट पर अंग्रेजी में तो ढेरो जानकारी भरी पडी है पर हिंदी में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। यह यात्रा संस्मरण लिखने की एक बड़ी वजह यह है कि मैं चाहता हूं की इंटरनेट पर हिंदी में भी यात्रा संबंधी भरपूर सामाग्री हो। सहयात्री की तलाश में अपने कई पत्रकार मित्रो से चर्चा की पर बात टिकट निकालने तक नही पहुंच पाई। इसी दौरान अपने मित्र लोकगायक सुरेश शुक्ला से विदेश यात्रा पर चलने की चर्चा की तो वे अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए तैयार हो गए।
                       अब बारी थी, जगह के चुनाव की। इसके लिए बजट का भी ध्यान रखना था। श्रीलंका,  इंडोनेशिया, थाईलैंड और मॉरिशस के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की तो हमारे बजट के हिसाब से थाईलैंड ही ज्यादा मुफीद लगा। वहाँ जाने के लिए एयर टिकट भी सबसे सस्ते मिल रहे थे। कोलकता से तो थाइलैंड की राजधानी बैंकाक आने जाने का एयर टिकट 10 हजार में मिल रहा था। इस लिए हमने पहले मुम्बई से कोलकाता ट्रेन से जाने और फिर वहा से फ्लाइट पकड़ने की योजना बनाई पर इसमे समय अधिक लग रहा था। नौकरीपेशा लोगों के सामने ऑफिस से छुट्टी की भी एक समस्या होती है। आखिरकार हर रोज मेक माय ट्रिप  के मोबाइल एप पर एयर टिकट की जानकारी लेते-लेते एक दिन पता चला कि मुंबई से बैंकाक की सीधी उड़ान का टिकट 16 हज़ार (आने जाने का) में मिल रहा। यह किराया हमे सही लगा। मैने सुरेश से बोला भाई टिकट निकाल लेते हैं। सुरेश ने बताया कि अपने एक मित्र संतोष सागर जी भी साथ चलना चाहते हैं। संतोष बालीवुड में बतौर डांस डायरेक्टर सक्रिय हैं। मैंने कहा दो से भले तीन। आखिरकार 4 जून 2017 को हमने मुंबई टू बैंकाक का एयर टिकट बुक कर लिया। तब तक संतोष के पास पासपोर्ट नही था। टिकट बुक करने के बाद उन्होंने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया और 15 दिनों के भीतर पासपोर्ट उनके हाथ मे था। उनका पासपोर्ट भाग्यशाली था कि बनते ही उसे विदेश यात्रा का मौका मिल रहा था।
                      11 सितंबर 2017 की रात 11.30 बजे इंडोनेशिया की सरकारी विमान कंपनी गरुण से हमे उड़ान भरनी थी और वापसी का टिकट 18 सितंबर की शाम 5 बजे की फ्लाइट से थी। बैंकाक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट से सीधे पटाया और फिर वहां से वापस बैंकाक आने की योजना बनी। एयर टिकट के बाद अब वहां ठहरने का इंतज़ाम करना था। इंटरनेट पर होटल बुकिंग वाली वेबसाइट की भरमार है। सितंबर का महीना थाईलैंड में पर्यटन के लिए ऑफ सीजन होता है। क्योंकि वहाँ यह मौसम बारिश का होता है। goibibo से हमने पटाया में दो दिन रुकने के लिए 4357 रुपये में होटल बुक किया। सेंट्रल पटाया स्थित इस होटल का नाम है प्रिवी सूट। अब चार दिन बैंकाक में रुकने के लिए आशियाने की तलाश थी। इसी वेबसाइट से बैंकाक के लिए होटल की तलाश शुरू की। हम चाहते थे होटल मुख्य शहर के बीच हो जिससे यात्रा में समय न जाये। आखिर हमारी तलाश बैंकाक के sukhumwit स्थित sukhumwit paradise होटल पर खत्म हुई। चार दिन के लिए हमे 9500 भारतीय रुपये चुकाने पड़े। संतोष जी के क्रेडिट कार्ड से भुगतान किया गया। बैंकाक एयरपोर्ट से पटाया जाने के लिए इंटरनेट से कार भी बुक कर ली थी। इसके लिए 1 हजार बाट ( 2 हजार भारतीय रुपये) चुकाने थे। कार कंपनी ने मुझे ईमेल भेज कर बता दिया था कि एयरपोर्ट पर हमारा ड्राइवर आप की नाम पट्टिका के साथ खड़ा रहेगा।
                   इस बीच भारतीय मुद्रा और थाईलैंड की मुद्रा बाट के मूल्य के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि छोटे से देश थाईलैंड की मुद्रा बाट भी हमारे रुपये पर भारी है। 500 बाट के लिए हमे 1000 भारतीय रुपये चुकाने होंगे। एयर टिकट और होटेल बुकिंग के बाद अब यात्रा के लिए चार महीने इंतज़ार करने थे। विदेश यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण काम उस देश का वीसा हासिल करना होता है। थाईलैंड में भारतीयों के लिए वीसा ऑन अराइवल की सुविधा है। यानी वहाँ एयरपोर्ट पर ही वीसा दे दिया जाता है। हालांकि यहां से भी वीसा लेकर जा सकते हैं। इसी दौरान फेसबुक से पता चला कि गांव का एक लड़का थाईलैंड घूम रहा है। उसके लौटने पर फोन पर सम्पर्क कर वहाँ की यात्रा के बारे में जानकारी हासिल की तो उसने बताया कि यही से वीसा लेकर जाना सुविधाजनक होगा। क्योंकि वहाँ एयरपोर्ट पर वीसा लेने में घंटो लग जाते हैं। उसने हमें मुंबई से ही वीसा दिलाने का आश्वासन दिया। उसके बताये अनुसार हमने सभी जरूरी कागजात वीसा फॉर्म, एयर टिकट, होटल बुकिंग की रसीद, दो फ़ोटो और अपने बैंक खाते का 6 माह का अकाउंट स्टेटमेंट ( जिससे पता चल सके कि आप के खाते में कम से कम 50 हजार की धनराशि है) और 1200 रुपये फीस उसे सौप दिया। यात्रा के एक सप्ताह पहले मैंने वीसा के लिए अपने गांव वाले उस शख्स से संपर्क किया तो पता चला कि वीसा के लिए उसने कुछ किया ही नहीं। किसी तरह उससे कागजात और पैसे वापस लिए। हम यही से वीसा लेकर जाना चाहते थे। अंतिम समय मे गांव वाले ने धोखा दे दिया था। मैंने अपनी यह समस्या अपने मित्र एयर इंडिया में अधिकारी अब्बास भाई को बताई तो उन्होंने मिनटो में इस समस्या का समाधान निकाल दिया। अब्बास भाई ने मेरे घर के पास वाकोला के ही एक ट्रेवेल एजेंट को फोन कर दिया। सोमवार की रात हमे बैंकाक के लिए रवाना होना था और बुधवार को हमने उस एजेंट को कागजात और फीस के 3-3 हजार सौप दिए। शुक्रवार को हमे वीसा स्टाम्प के साथ पासपोर्ट वापस मिल गया। 
                    आखिरकार यात्रा का दिन आ गया। यात्रा की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी। पर यात्रा के दिन पता चला कि एक सबसे जरूरी काम बाकी रह गया था। मेरी पारिवारिक मित्र पूर्व पत्रकार और अब अमेरिकन काउंसलेट की मीडिया सलाहकार प्रियंका ने फोन कर पूछा कि सब तैयारी हो गई? मनी एक्सचेंज कराया कि नही? मैंने कहा कि मनी एक्सचेंज एयरपोर्ट पर ही कराएंगे। थोड़े दिनों पहले अमेरिका की यात्रा कर चुकी प्रियंका ने बताया कि एयरपोर्ट पर मनी एक्सचेंज कराना घाटे का सौदा होगा। वहाँ कम कीमत मिलती है। उन्होंने अमेरिका जाने से पहले निजी मनी एक्सचेंज वाले से अपने रुपये डॉलर में बदले थे। प्रियंका ने उस मनी एक्सचेंज वाले का नंबर भी दिया। मैंने उससे बात की तो उसने 10 हजार भारतीय रुपये का 5 हजार बाट देने की बात कही। पर इसके लिए सीएसटी आने के लिए बोला। समय बहुत कम बचे थे। एयरलाइन से कहा गया था कि कम से कम 3 घंटे पहले एयरपोर्ट पहुँच जाएं। इस लिए सीएसटी पहुच कर मनी एक्सचेंज करना संभव नही लगा। इस बीच इंटरनेट पर छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट की वेबसाइट पर मनी एक्सचेंज रेट पता किया तो अच्छा रेट दिख रहा था। इस लिए एयरपोर्ट पर ही मनी एक्सचेंज कराने का फैसला लिया। 11 सितंबर 2017 की शाम 7.30 बजे हम मुंबई के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पहुच गए थे। पहला काम मनी एक्सचेंज का था। वहाँ मनी एक्सचेंज के लिए कई बैंको और ट्रेवेल एजेंसियों के काउंटर खुले हुए हैं। एक काउंटर पर पहुँच कर इंडियन रूपीस और थाई बाट का एक्सचेंज रेट पता किये तो होश उड़ गए। बाजार की तुलना में यहाँ बहुत कम रेट मिल रहे थे। पता चला कि 30 हजार रुपये के 12200 बाट मिलेंगे। जबकि बाजार में निजी एक्सचेंज वाले 15000  बाट दे रहे थे। यानी 30 हजार के एक्सचेंज पर 6-6 हजार का नुकसान। अब कोई और विकल्प नही दिखा तो उसी रेट में मन मारकर एक्सचेंज करवा लिया। इसी दौरान पता चला कि थाइलैंड में भारतीय रुपये का बड़े आराम से अच्छे भाव मे एक्सचेंज हो जाता है। इस लिए मेरे सह यात्री सुरेश और संतोष ने अपनी थोड़ी थोड़ी राशि ही एक्सचेंज कराई। एक्सचेंज के बाद बोर्डिग पास लेने और अपना लगेज एयरलाइन कर्मचारियों के हवाले करने बाद अब बारी सुरक्षा जांच और इमिग्रेशन पार करने की थी। ये सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद रात 11 बजे हम गरुण एयरलाइन की फ्लाइट में थे। अब चार घंटे का समय बिताना था। सीट के आगे लगी वीडिया स्क्रीन को खंगाला तो उसमे तो दो हिंदी फिल्मे लाइफ ऑफ पाई और उड़ाता पंजाब मिल गई। दोनो फिल्मे देखी हुई थी पर रात काटने के लिए इन्ही का सहारा लिया।
               12 सितंबर 2017 की सुबह 4 बजे हमारा विमान बैंकाक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट पर पहुच चुका था। हम भव्य एयरपोर्ट पर उतर चुके थे। पूछते-पूछते इमिग्रेशन गेट की तरफ बढ़े तो रास्ते मे वीसा ऑन अराइवल का बोर्ड दिखा। हमारे साथ विमान में आये भारतीय लोग वीसा के लिए लाइन में लग गए। हम खुश हुए की हमारे पास पहले से वीसा है, इस लिए यहाँ लाइन में लगने से बच गए। हम आगे इमिग्रेशन गेट की तरफ बढ़े। वहाँ पहुच कर पता चला कि भले ही हमारे पास पहले से वीसा है पर हमें भी इमिग्रेशन फॉर्म भरना पड़ेगा। वहाँ मौजूद महिला कर्मचारी ने हमे इमिग्रेशन फॉर्म पकड़ाया और हम उसे भरने में जुट गए। फॉर्म भर इमिग्रेशन काउंटर की लाइन में खड़े हो गए। सुरेश और संतोष भी दो अलग अलग लाइनों में लग गए। काउंटर पर बैठी महिला ने वहाँ लगे मिनी कैमरे से मेरी तस्वीर ली और बगैर कोई सवाल जवाब के पासपोर्ट पर इमिग्रेशन की मुहर लगा दी। बगल वाली लाइन में लगे सुरेश भी काउंटर पर पहुच गए थे। उनके काउंटर का इमिग्रेशन अधिकारी थोड़ा कड़क मिजाज वाला था। उसने सुरेश से पूछा जेब मे 10 हजार थाई बाट है क्या दिखाओ ? सुरेश ने पर्स से बाट के नोट दिखाए तो अधिकारी ने पासपोर्ट पर मुहर लगा दी। इमीग्रेशन से निपट कर हम अपने सामान लेने के लिए लगेज बेल्ट पर पहुचे तो देखा हमारे विमान के जो सहयात्री वीसा ऑन अराइवल के लिए लाइन में लगे थे वे हमसे पहले समान ले चुके थे। मैने पूछा क्या भाईलोग वीसा मिल गया क्या। जवाब में हां सुना तो लगा हम फालतू में पहले से ही वीसा हासिल करने के लिए इतने परेशान हुए। वीसा ऑन अराइवल वालो को इमिग्रेशन फॉर्म भी नही भरना पड़ा। जितने समय हमें इमिग्रेशन काउंटर पर लगे, उसमे कम समय मे भाई लोगो को वीसा मिल गया। खैर आदमी इसी तरह अनुभव से ही सिखाता है।
                    हम भी अपना सामान लेकर बाहर गेट पर पहुच चुके थे। वहां तमाम लोग नाम पट्टिका लेकर यात्रियों का इंतज़ार कर रहे थे। उसी में मैं भी अपना नाम खोजने लगा। तभी सुरेश की नज़र एक थाई युवक पर पड़ी, जिसके हाथ के कागज पर vijay kumar singh अंकित था। हम उसके पास पहुचे। कार में समान रखा और बैंकाक से पटाया की 150 किलोमीटर की यात्रा शुरू हो गई। सड़क बहुत अच्छी थी। कही छोटे बड़े गढ्ढे का नामोनिशान नही। कुछ ही समय मे हमारी किराये की कार बैंकाक-पटाया हाइवे पर सरपट दौड़ रही थी। 150 किलोमीटर की यह दूरी डेढ़ घंटे में तय हो गई थी।
अंग्रेजी से यारी नहीं
दुनिया मे सबसे ज्यादा पर्यटक थाईलैंड में आते हैं। इसके बावजूद यहां के लोगों का अंग्रेजी ज्ञान बहुत सीमित है। मुश्किल से टूटी फूटी अंग्रेजी बोल पाते हैं। यही हाल हमारे चालक महोदय का भी था। इस लिए रास्ते मे उनसे ज्यादा संवाद नही हो सका।  ड्राइवर को हमने होटल का पता मोबाइल पर दिखा दिया था। इस लिए बगैर पूछताछ की उन्होंने हमें हमारे होटल पर पहुँचा दिया। होटल पहुंच कर पता चला कि चेक इन टाईम दोपहर दो बजे हैं, जबकि उस वक्त सुबह के 8 बज रहे थे। होटल के रिसेप्शन पर हमारी मुलाकात फिलीपिंस के रहने वाले माईकल से हुई। माईकल रोजगार की तलाश में पटाया आ गए थे। चुंकि थाई लोगों के मुकाबले उन्हें अच्छी अंग्रेजी आती थी इस लिए यहां उन्हें आसानी से नौकरी मिल गई थी। दोपहर के 2 बजने में काफी समय था।हमारी परेशानी को भांपते हुए माईकल ने बताया कि यदि आप 500 बाट अतिरिक्त भुगतान करते हैं तो हम अभी कमरा उपलब्ध करा देंगे। हम इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। हमारे ग्रुप के कोषाध्यक्ष संतोष ने तुरंत 500 बाट का भुगतान कर दिया। यात्रा खर्च के लिए हमनें पहले ही पांच-पांच हजार बाट संतोष के पास जमा कर दिए थे। (जारी) 
                 ( लेखक दैनिक भास्कर, मुंबई के प्रमुख संवाददाता हैं)



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