फिर हारा लोकतंत्र
उत्तर प्रदेश विधान परिषद् चुनाव परिणामो से मायावती और उनके शागिर्द भले ही फूले न समां रहे हो, पर चुनाव परिणामो ने बुद्धिजीवी वर्ग को निराश ही किया है. बसपा उम्मीदवारों ने जिस तरह बाहुबल और पैसे से वोट खरीद कर अपनी जीत तय की उससे एक बार फिर लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ है. चुनाव परिणामो से मायावती चाहे अपनी जितनी पीठ थप थापा ले. पर इससे यूपी की तस्वीर नहीं बदलने वाली है. यूपी की इस हालत से वहा के लोगो को भेले ही कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन यूपी के जंगल राज से पस्त होकर रोजगार की तलाश में मुंबई जैसे शहरों में शरण लेने वाले उत्तरप्रदेशीय इस प्रदेश की राजनीति में दिनप्रतिदिन माफियाओ की बढती हिस्सेदारी से दुखी है. रोजगार की तलाश में यूपी से पलायन करने वाले लोगो को बाहर अपमान का जो घुट पीना पड़ता है. उसका अहसास न मुलायम को होगा और न ही जीते जी देवी बनाने की ख्वायिस रखने वाली मायावती को. अपने प्रदेश से दूर रहने वालो की यह आशा अब तम तोड़ने लगी है की कभी न कभी इस देवभूमि के दिन बहुरेंगे. क्योकि यूपी के लोगो ने बारी-बारी से सबको देख लिया है. कोई भी प्रतिभाओ से भरे इस प्रदेश की तस्वीर बदलने का साहस नहीं दिखा सका है. हर कोई केवल राजनीतिक रोटी सकने में लगा है. इसके लिए यहाँ के लोग भी कम जिमेदार नहीं. जाती-बिरादरी के चक्कर में माफियाओ को अपना जनप्रतिनिधि चुन कर क्या मिलने वाला है, सिवाय इस प्रदेश की साख को बट्टा लगाने के.
उत्तर प्रदेश विधान परिषद् चुनाव परिणामो से मायावती और उनके शागिर्द भले ही फूले न समां रहे हो, पर चुनाव परिणामो ने बुद्धिजीवी वर्ग को निराश ही किया है. बसपा उम्मीदवारों ने जिस तरह बाहुबल और पैसे से वोट खरीद कर अपनी जीत तय की उससे एक बार फिर लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ है. चुनाव परिणामो से मायावती चाहे अपनी जितनी पीठ थप थापा ले. पर इससे यूपी की तस्वीर नहीं बदलने वाली है. यूपी की इस हालत से वहा के लोगो को भेले ही कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन यूपी के जंगल राज से पस्त होकर रोजगार की तलाश में मुंबई जैसे शहरों में शरण लेने वाले उत्तरप्रदेशीय इस प्रदेश की राजनीति में दिनप्रतिदिन माफियाओ की बढती हिस्सेदारी से दुखी है. रोजगार की तलाश में यूपी से पलायन करने वाले लोगो को बाहर अपमान का जो घुट पीना पड़ता है. उसका अहसास न मुलायम को होगा और न ही जीते जी देवी बनाने की ख्वायिस रखने वाली मायावती को. अपने प्रदेश से दूर रहने वालो की यह आशा अब तम तोड़ने लगी है की कभी न कभी इस देवभूमि के दिन बहुरेंगे. क्योकि यूपी के लोगो ने बारी-बारी से सबको देख लिया है. कोई भी प्रतिभाओ से भरे इस प्रदेश की तस्वीर बदलने का साहस नहीं दिखा सका है. हर कोई केवल राजनीतिक रोटी सकने में लगा है. इसके लिए यहाँ के लोग भी कम जिमेदार नहीं. जाती-बिरादरी के चक्कर में माफियाओ को अपना जनप्रतिनिधि चुन कर क्या मिलने वाला है, सिवाय इस प्रदेश की साख को बट्टा लगाने के.
मुंबई में इन दिनों एक बहस तेज है की यूपी-बिहार से आने वाली भीड़ की वजह से मुंबई का सत्यानाश हो रहा. हालांकि यह बात जिस तरीके से कही जा रही है. उस पर मुझे एतराज है. पर इस सचाई से मुह नहीं मोड़ा जा सकता की यूपी-बिहार से आने वाली भीड़ न रुकी तो यहाँ स्थिति भयावह हो जाएगी. आखिरकर यूपी-बिहार के सत्ताधीश कुछ करते क्यों नहीं. इन दोना प्रदेश के मेहनतकश लोग अपने खून-पसीने से दुसरे प्रदेशो की तस्वीर बदल रहे है पर अपने ही घर में करने के लिए इनके पास कुछ भी नहीं है. यदि होता तो ये मुंबई की लोकल ट्रेनों में हर रोज भैया है की गली खाने क्यों यहाँ आते. ये खुद को मिलने वाली हर गली का बदला यूपी-बिहार के नेताओ का गाली देकर चुकता करते है. इसके अलावा ये कर भी क्या सकते है.
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