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गली-गली में शोर है, नेता साला चोर है...... विजय सिंह कौशिक यह मै नहीं कह रहा हूँ.यह रामगोपाल वर्मा की 26 जनवरी को रिलीज हो रही फिल्म रण के गीत के बोल है. देश में बढती आत्महत्या, दहेज़, ग्लोबल वार्मिंग जैसी बहुत सी समस्याए है, जिनके लिए जागरूकता अभियान चलाने की बात होती रहती है. पर दिन प्रतिदिन राजनीति और नेताओ के गिरते स्तर को लेकर कब और कौन अभियान चलाएगा. यह सचाई है की हम नेताओ को चाहे जितना गाली दे दे.पर देश के इन नित-नियंताओ के बगैर काम भी नहीं चलने वाला नहीं है.आम आदमी नेताओ को गाली दे कर भले खुश हो ले पर इन्हें देश को लुटने से नहीं रोक सकते. क्योकि हर पाच बाद ये आप से वोट मागने आयेंगे.हो सकता है की इनसे नाराज होकर आप वोट देने जाये ही न जाये.लेकिन अपने इस कर्म से आप इन्हें लोकसभा और विधान सभा में पहुचने से नही रोक पाएंगे. मतदान जाहे २० प्रतिशत हो या ८० इससे इन्हें कई फर्क नहीं पड़ने वाला. इनकी जीत किसी भी तरह पक्की होनी चाहिए. पर आम आदमी करे भी तो क्या. सिनेमा हॉल में जब नेता साला.... का गीत बजेगा तो दर्शक ताली जरुर बजायेंगे. पर कल जब अपने इलाके के एमपी या विधायक से कोई काम लगा...
                                फिर हारा लोकतंत्र उत्तर प्रदेश विधान परिषद् चुनाव परिणामो से मायावती और उनके शागिर्द भले ही फूले न समां रहे हो, पर चुनाव परिणामो ने बुद्धिजीवी वर्ग को निराश ही किया है. बसपा उम्मीदवारों ने जिस तरह बाहुबल और पैसे से वोट खरीद कर अपनी जीत तय की उससे एक बार फिर लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ है. चुनाव परिणामो से मायावती चाहे अपनी जितनी पीठ थप थापा ले. पर इससे यूपी की तस्वीर नहीं बदलने वाली है. यूपी की इस हालत से वहा के लोगो को भेले ही कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन यूपी के जंगल राज से पस्त होकर रोजगार की तलाश में मुंबई जैसे शहरों में शरण लेने वाले उत्तरप्रदेशीय इस प्रदेश की राजनीति में दिनप्रतिदिन माफियाओ की बढती हिस्सेदारी से दुखी है. रोजगार की तलाश में यूपी से पलायन करने वाले लोगो को बाहर अपमान का जो घुट पीना पड़ता है.  उसका अहसास न मुलायम को होगा और न ही जीते जी देवी बनाने की ख्वायिस रखने वाली मायावती को. अपन...
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क्या मिलेगा पूर्वांचल से यह मेरा तर्क है * विजय सिंह "कौशिक" कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी की उत्तर प्रदेश में सक्रियता से परेसान मायावती ने पूर्वांचल राज्य का शगुफा छोड़कर लोगो का ध्यान बाटने की कोशिस की है. इससे भले ही मायावती को राजनीतिक लाभ मिले पर अलग पूर्वांचल से वहा के लोगो कुछ नहीं मिलने वाला है. मेरा मानना है की यदि नेतृत्व काबिल न हो तो छोटे राज्य भी विकास की गारंटी नहीं हो सकते. पूर्वांचल में माफियाओ का राज्य चलता है. अब ये माफिया राजनीती का चोला पहन चुके है. कल तक जिन्हें पुलिस खोजती फिरती थी. आज वही पुलिस उनकी जी-हजुरी करने को मजबूर है. अपने बड़े आकार के चलते देश की देश की राजनीति तय करने वाले उत्तर प्रदेश के विभाजन से इस राज्य की राजनीतिक ताकत घटेगी. जिसकी वजह से राज ठाकरे जैसो को पूर्वांचलवासियों ( पूर्वांचल राज्य बना तो) पर निशाना साधना और आसान हो जायेगा. यह वही मायावती है जिन्होंने कभी राज ठाकरे की घटिया राजनीति की मुखालफत नहीं की. क्योकी उन्हें दलित बाहुल्य maharastra में अपनी पार्टी बसपा की भविष्य उज्जवल नज़र आ रहा था. हालाँकि लोकसभा और विधान सभा चुना...